कितने पाकिस्तान
'कितने पाकिस्तान'
समीक्षा
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कमलेश्वर के 'कितने पाकिस्तान' को पढ़ने से पहले हमारे जेहन में कुछ प्रश्न आ सकते हैं। जिनके जवाब है:-
1. कितने पाकिस्तान कैसी रचना है..?
यह, समय की अदालत में दुनिया का कोरा सच है। कठघरे में प्रत्येक वक्त से सवाल जवाब है। सभी दानिशमंदो की पेशी का नजराना है।
2. इसमे क्या है..?
इसमे बटते हुए देश, और बटते हुए इंसानो में हर रोज बन रहा न जाने कितने पाकिस्तान है।
अदीब और अर्दलि की अदालत में मुसाफिरो के न्याय की माँग है। गुहार लगाती हुई लाशें और उनकी स्पष्ट बयानबाजी है।
यह मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है। इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परम्परा अब खत्म हो।
3. मुख्य बात..?
अर्दली ने वक्त की इस अदालत में सदियों के राजाओ, शहंशाओ, इतिहासकारो समेत तमाम बुद्धिजीवियो से सवालात किये हैं।
हर दस्तकें यहाँ मौजूद हुई हैं। झूठ और सच का पर्दा फ़ास हुआ है।
भूत के जख्मों को कुरेदते हुए वर्तमान से सवाल करते हुए भविष्य को याद किया गया है।
समय, समाज का यथार्थ और युद्ध की त्रासदी बयान है।
तो आइए इसपे चर्चा करते हैं।और जानते हैं उपन्यास की कुछ मुख्य बातें :-
उपन्यास का लेखक विद्या से प्यार करता है। इसीलिए उसे आज भी कानपुर स्टेशन पर रुमाल गिरते हुए दिखाई देता है।
वह लिखता है। बेबाक लिखता है। समय लिखते हुए समाज लिखता है। समाचार लिखता है।
अपने पत्रों, लेखों, कालमो द्वारा सोते हुए इंसानों को जगाता है। उसे ऐसे लिखने से किसी अनहोनी का डर रहता है। इसलिए वह मृत्यु के बदले जीवन तलाश रहा है।
और तभी उसे गिलगमेश की आवाज सुनाई देती है "मै पीड़ा से लड़ूंगा.... यातना सहुगा... कुछ भी हो मैं मृत्यु को पराजित करूंगा... मैं मृत्यु से औषधि खोज कर लाऊंगा।"
इस आवाज से उसे और पूरी मानवता को एक अदृश्य शक्ति मिल गई।
और वह उसी दिन से लड़ रहा है। जी रहा है। इंतज़ार कर रहा है। गिलगमेश के आने का।
उसने ही प्रेम इजात किया। मित्रता इजात किया। और मानवता के लिए लगा हुआ है लगातार।
वह लड़ रहा है। लगातार लड़ रहा है। इस दुनिया की तमाम त्रासदियो को याद करते हुए खुद को खोज रहा है। वह याद करता हुआ अदालत लगाता है। वह सबको बुलाता है। गांधी, आइंस्टीन, स्वामी सहजानंद, राहुल बाबा, सहाबुद्दीन, अशोक सिंघल, अवैधनाथ, जिन्ना, नेहरू,सावरकर,हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, आदि को याद करता हुआ बदौड़ा गुजरात, आयोध्या के दंगो का हिसाब माँग रहा है। वह कश्मीर के साथ पाकिस्तान बन जाने का कारण खोज रहा है।
वह हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद के साथ पूरे भारत को समझ रहा है। उसकी अदालत में सबका केस एक साथ चल रहा है। यहाँ कोई नहीं बच सकता। क्योकि एक कोने खड़ा समय सत्य सबको शोध रहा है।
वह इंसानों को इंसानी जड़ों से पहचान रहा है ताकि वह उनके दुःख दर्द को समझ सके।
वह आवाज लगा रहा है कि मेरे दोस्तों समकालीनो राकेश, रेडू दुष्यंत राही परसाई रघुवीर, आदि मेरा साथ दो। इस न्याय की चौखट पर मेरा साथ दो।
लेखक आधुनिक युग से होते हुए आदिकाल में चला जाता है। या उससे भी पहले। लेखक सुमेरियन, असीरियन सभ्यता के बेबोलियन सभ्यता संस्कृति की बात करता है।
वह मुगलकालीन समय को जी रहा है।
वह औरंगजेब, दाराशिकोह के साथ तमाम बड़े शहंशाहों से सवाल कर रहा है।
लेखक का साथ देने तत्कालीन गवाहकार, इतिहासकार मौजूद हैं।
आरोप प्रत्यारोप की झड़िया लगी हुई हैं। यहाँ तर्कों की बहस जारी है। यहाँ हर कोई घसीटा जा रहा है। गवाही देने में कलयुग भी आया है।और दूसरी तरफ हिरोशिमा, और नागासाकी अपने दुःख को लिए हुए खड़े हैं।
इस अदालत में भूत, वर्तमान, भविष्य एक साथ खड़े हैं।
लेखक सबको समझ रहा है। लेखक की अदालत में लगातार दस्तकें पड़ रही हैं। खून का सैलाब आ गया है। दर्द और चितकार सामने आ गए हैं।
लेखक तलाश कर रहा है कि इस दुनिया में कितने पाकिस्तान बने हैं। और कब कब किस परिस्तिथि में बने हैं।
वह माउंटबेटन से सवाल कर रहा है। कि क्यूँ तुमने एक और पाकिस्तान का निर्माण किया। लेखक अपनी कहानियो को छोड़ दुनिया की तमाम कहानियो की छानबीन कर रहा है। विभाजन और दंगे का दर्द से लेखक का हृदय द्रवित हो गया है।
लेखक इन सबसे लड़ रहा है।
उसने भविष्य को चेतावनी सहित चुनौती पेश की है। कि तुम्हारे वर्तमान के कर्मों का हिसाब भविष्य लेगा। ये युध्द किसी समस्या का हल नहीं। क्योंकि दुनिया का आखिरी सच शांति है। हमें विश्वास रखना होगा। विश्वास से ही मानवता और इंसानियत जिंदा है। लेखक जीतेगा। और उसके साथ ही जीतेंगे हम सब भी।
लेखक जीवन और उसके विश्वास को बचाए हुए है।
क्योकि उसे भरोसा है कि एक दिन प्रमथ्यु के कंधे पर बैठा गिद्ध उसका मांस नोचते नोचते थक जाएगा।
तब मानवता और जीवन की जीत होगी। इन सब के बीच लेखक को कानपुर की याद आती है। जहाँ आज भी उसे एक रुमाल गिरता हुआ दिखाई देता है।
पाने के लिए बहुत कुछ है इसमे और खोने के लिए कुछ भी नहीं। तो पढ़िए।
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(सुधीर द्रन्च)
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